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सारनाथ मन्दिर
Sarnath Mandir


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सारनाथ बौद्ध मन्दिर
Sarnath Mandir






काशी से सात मील दूर पूर्वोत्तर में बौद्धों का प्राचीन तीर्थ सारनाथ स्थित है। बौद्ध धर्म के अनुयायी सारनाथ के प्रति बहुत ही श्रद्धा रखते हैं। सारनाथ प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केन्द्र रहा है। मान्यता है कि भगवान गौतम बुद्ध गया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद सर्वप्रथम यही पर आए थे और उन्होने कौडिन्य आदि अपने कई पूर्व साथियों को प्रथम बार ज्ञान देकर बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था। इसी प्रथम प्रवचन को धर्म चक्र-प्रर्वतन कहा जाता है तथा यही से बौद्ध धर्म की शुरुआत मानी गयी है।

कहते है कि तीसरी शताब्दी ईसवी पूर्व में सम्राट अशोक सारनाथ आये थे और उन्होने यहाँ कई स्तूप और एक सुन्दर प्रस्तर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर मौर्य सम्राट की एक धर्म लिपि अंकित है। इसी स्तम्भ का सिंह शीर्ष तथा धर्म चक्र को भारतीय गणराज्य का राष्ट्रीय चिन्ह बनाया गया है। चौथी शताब्दी में चीनी यात्री फाह्नयान ने भी सारनाथ में आकर यहाँ चार बड़े स्तूप और पांच विहारों का वर्णन किया है। सातवी शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री हुवेनसांग ने भी सारनाथ की यात्रा की थी तथा उन्होने यहाँ के तीस बौद्ध विहार जिसमें पन्द्रह सौ बौद्ध भिक्षु निवास करते थे के बारे में लिखा है। यहाँ का धामेक स्तूप आज भी सारनाथ की प्राचीनता एवं भव्यता का प्रतीक है।

प्राचीन समय में सारनाथ में घना वन था तथा इसे “ऋषि पतन मृगदाय” के नाम से जाना जाता था क्योंकि यहाँ पर अनेको ऋषिमुनि मृगों के साथ रहते थे। इस जगह का सम्बन्ध बौद्धिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर भी स्थित हैं। जहँा सावन के महीने में हिन्दुओं का बड़ा मेला लगता है। सारनाथ को जैन तीर्थ भी कहा गया है। जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर नाम दिया गया है। सारनाथ के अन्य दर्शनीय स्थलों में भगवान बुद्ध का मन्दिर, धमेक स्तूप, अशोक का चर्तुमुख सिंह स्तम्भ, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, नवीन विहार, चौखंडी स्तूप आदि प्रमुख स्थल है।









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