Home Hindi तिल विचार स्वर का महत्व | जीवन में स्वर का महत्व

स्वर का महत्व | जीवन में स्वर का महत्व

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स्वर का महत्व
Swar ka Mahatva

जीवन में स्वर का महत्व
Jeevan me swar ka mahatva

स्वर विज्ञान इस संसार का बहुत ही महत्वपूर्ण और आसान ज्योतिष विज्ञान है जिसके बताये गए संकेत बिलकुल सही माने जाते है और इसकी सहायता से हम अपने जीवन कि दिशा और दशा को बदल सकते है।हमारे शरीर की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं, संसार के सभी व्यक्तियों से लेकर दैवीय सम्पर्कों तक को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला स्वर विज्ञान दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
स्वर विज्ञान कि सहायता से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में मनचाही सफलता हासिल कर सकता है। इसकी मदद से व्यक्ति अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति और परिस्तिथियों को अपने पक्ष में कर सकता है।

हमारी नाक में दो छिद्र होते हैं। सामान्य अवस्था में इनमें से एक ही छिद्र से हवा का आवागमन होता रहता है। कभी दायें से तो कभी बाएं से इसे ही हम दायाँ और बायाँ स्वर का चलना कहते है। लेकिन जिस समय स्वर बदलता है तो उस समय कुछ पल के लिए दोनों छिद्रों से में हवा निकलती हुई महसूस होती है। इसके अलावा कभी – कभी सुषुम्ना नाड़ी के चलते समय हमारे दोनों नाक के छिद्रों से हवा निकलती है।

बांयी तरफ से सांस लेने का मतलब है कि हमारे शरीर की इड़ा नाड़ी में वायु का प्रवाह है।

इसके विपरीत दायीं तरफ से सांस लेने का मतलब है कि हमारे शरीर की पिंगला नाड़ी में वायु का प्रवाह है।

लेकिन दोनों के मध्य में सुषुम्ना नाड़ी का स्वर प्रवाह होता है।


हम अपनी नाक से निकलने वाली साँस के संकेतो को समझ कर अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में मनचाहा परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जिस तिथि या वार को जिस छिद्र से साँस लेनी चाहिए, अगर वही होता है तो हमें उस दिन अच्छे परिणाम मिलेंगे । लेकिन अगर उल्टा हुआ तो हमें उस दिन निराशा मिल सकती है। इसलिये किस दिन किस छिद्र से साँस चलनी चाहिए हम इसका ज्ञान हासिल करके जीवन में लगातार उन्नति के पथ पर चल सकते है जो कि सभी के लिए बहुत ही आसान है।

सप्ताह के तीन दिन मंगल, शनि और रवि गर्म मने जाते है क्योंकि इनका संबंध सूर्य स्वर से है जबकि शेष चार दिनों का संबंध चन्द्र स्वर से माना जाता है।

हमारे दांये छिद्र से निकलने वाली सांस पिंगला स्वर को सूर्य स्वर कहा जाता है और जैसा कि नाम ही है यह गरम होती है।
और बांयी ओर से निकलने वाली साँस इड़ा स्वर को चन्द्र स्वर कहा जाता है और अपने नाम के अनुरूप यह यह स्वर ठण्डा होता है।

सवेरे नींद से जगते ही सबसे पहले अपनी नासिका का स्वर देखें। यदि नियत तिथि के अनुसार स्वर चल रहा हो तो बिस्तर पर ईश्वर कि प्रार्थना करने के बाद वही पैर धरती पर रखे। यदि तिथि के विपरीत स्वर हो, तो बिस्तर से नीचे नहीं उतरें और जिस तिथि का स्वर होना चाहिए उसके विपरीत करवट लें कर कुछ मिनट लेट लें। और जब सही स्वर शुरू हो जाए तो उसके बाद ही बिस्तर से नीचे स्वर कि तरफ वाला पाँव रखे ।

अर्थात यदि बांये स्वर का दिन हो और वही चल रहा हो तो बिस्तर से उतरते समय बांया पैर ही धरती पर रखें ,यदि दांये स्वर का दिन हो और वही चल रहा हो तो बिस्तर से उतरते समय दायाँ पैर ही धरती पर रखकर अपनी दिनचर्या शुरू करें ।

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