Wednesday, September 16, 2020
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नैत्रत्यमुखी भवन वास्तु

भूखण्ड का वास्तु
Bukhand Ka vastu

जिस भवन में केवल नैत्रत्य कोण यानि दक्षिणी पश्चिम दिशा में मार्ग होता है वह नैत्रत्यमुखी भवन कहलाते है । नैत्रत्य वास्तु की परिभाषा में सबसे निकृष्ट कहलाता है। इसे दुर्भाग्य अथवा नरक की दिशा भी कहते है । इसलिए इस दिशा के भवन में बहुत ही ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। राहु नैत्रत्य दिशा का स्वामी ग्रह और निरित्ती इसकी देवी है । राहु को छाया ग्रह माना गया है । गरुड़ पुराण के अनुसार निरित्ती का शरीर काला और भीमकाय है। इसीलिए इस दिशा को सबसे ऊँचा और भारी रखा जाता है । यह क्रूर स्वभाव की है और मनुष्य की ही सवारी करती है, इनका रंग काला है जो अंधकार का सूचक है अत: नैत्रत्य दिशा का रंग भी काला ही माना गया है ।

नैत्रत्यमुखी भवन के शुभ अशुभ प्रभाव गृह स्वामी, उसकी पत्नी और बड़े पुत्र पर पड़ता है । इस भवन में वास्तु दोष होने से आकस्मिक मृत्यु, आत्महत्या, प्राकृतिक विपदा, भूत प्रेत बाधा आदि अशुभ प्रभाव का सामना करना पड़ता है । वैसे तो इस नैत्रत्यमुखी भवन का यथा संभव त्याग ही कर देना चाहिए लेकिन इन भवनो में भी वास्तु के सिद्दांतों का पालन करते हुए अवश्य ही शुभ परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।

नैत्रत्य मुखी भवन में निर्माण के समय ही घर की नीवं में लोहा, ताम्बा, चाँदी या सोने का नागो का जोड़ा जमीन में अवश्य ही गाड़ देना चाहिए जिससे राहु और निरित्ती दोनों ही तृप्त रहे और घर के सदस्य उनके बुरे प्रभाव से बच सकें ।

नैत्रत्य मुखी भवन में इसका सम्मुख भाग बिलकुल भी बड़ा या कटा हुआ नहीं होना चाहिए ।

नैत्रत्य दिशा में खिड़की और दरवाजे या तो बिलकुल भी ना हो और यदि हो तो ज्यादातर बंद ही रहने चाहिए ।
नैत्रत्य मुखी भवन में मुख्य द्वार दक्षिणी नैत्रत्य एवं पश्चिमी नैत्रत्य दोनों ही में अच्छे नहीं समझे जाते है क्योंकि यह शस्त्रु की दिशा मानी जाती है, इसलिए मुख्य द्वार इस दिशा में नहीं वरन पश्चिम वायव्य दिशा में बनाना चाहिए । इस दिशा में द्वार बहुत बड़ा नहीं वरन छोटा बनाना चाहिए और एक बड़ा द्वार ईशान कोण में भी जरूर बनाना चाहिए ।

नैत्रत्य मुखी भवन में शुक्ल पक्ष के किसी अच्छे मुहूर्त में शनिवार को संध्या के समय ताम्बे में बने राहु यंत्र को स्थापित करना चाहिए । इसे इस दिशा में जो भी कमरा हो उसके दाहिनी तरफ टांगना चाहिए अथवा किसी उचित जगह ताम्बे की किलों से ही लगाना चाहिए ।

नैत्रत्य मुखी भवन के सम्मुख भाग में चारदीवारी से मिलाकर ही निर्माण कराना चाहिए इस दिशा में कुछ भी खाली स्थान बिलकुल भी नहीं छोड़ना चाहिए ।

नैत्रत्य मुखी भवन के सामने वाले हिस्से में बनाये गए कक्ष का फर्श एवं उसकी ऊंचाई दोनों ही ज्यादा होनी चाहिए एवं इस कोण के कक्ष की दीवारे भी यथा संभव मोटी रहनी चाहिए ।

नैत्रत्य कोण में बने कक्ष में सदैव भारी और अनुपयोगी सामान ही रखना चाहिए ।

भवन निर्माण में ईशान और नैत्रत्य दोनों ही दिशा बहुत प्रमुख मानी गयी है यह दोनों ही दिशाएं एक दूसरे से बिलकुल उलट है । नैत्रत्य दिशा ऊँची लेकिन ईशान दिशा नीची रहनी चाहिए, नैत्रत्य दिशा बंद अर्थात ढकी हुई लेकिन ईशान दिशा ज्यादा से ज्यादा खुली होनी चाहिए साथ ही नैत्रत्य दिशा भारी लेकिन ईशान दिशा सदैव हल्की रहनी चाहिए ।

नैत्रत्य मुखी भवन में सामने के भाग में यदि ऊँचे पेड़, ऊँचे टीले अथवा ऊँची इमारते हो तो यह बहुत ही शुभ होता है ।

नैत्रत्य मुखी भवन में सामने के भाग में गढ्ढेः बिलकुल भी नहीं होने चाहिए और इसके सामने का हिस्सा नीचा बिलकुल भी नहीं होना चाहिए । Published By : Memory Museum
Updated On : 2020-11-24 06:00:55 PM

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