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शनिवार का पंचांग, Shaniwar Ka Panchag

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Shaniwar Ka Panchag, शनिवार का पंचांग

आप सभी को शरद नवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें, माता रानी आपकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करें ।

  • Panchang, पंचाग, ( Panchang 2020, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-


1:- तिथि (Tithi)
2:- वार (Day)
3:- नक्षत्र (Nakshatra)
4:- योग (Yog)
5:- करण (Karan)


पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
जानिए शनिवार का पंचांग (Shaniwar Ka Panchang)।

  • शनिवार का पंचांग (Shaniwar Ka Panchang)
    17 अक्टूबर    शनिवार 2020
  • शनि देव जी का तांत्रिक मंत्र – ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।।
    ।। आज का दिन मंगलमय हो ।।

  • दिन (वार) -शनिवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से आयु का नाश होता है । अत: शनिवार को बाल और दाढ़ी दोनों को ही नहीं कटवाना चाहिए।
  • शनिवार के दिन प्रात: पीपल के पेड़ में दूध मिश्रित मीठे जल का अर्ध्य देने और सांय पीपल के नीचे तेल का दीपक जलाने से कुंडली की समस्त ग्रह बाधाओं का निवारण होता है ।
  • शनिवार के दिन पीपल के नीचे हनुमान चालीसा पड़ने और गायत्री मन्त्र की एक माला का जाप करने से किसी भी तरह का भय नहीं रहता है, समस्त बिग़डे कार्य भी बनने लगते है ।
  • शनि देव “पिप्लाद ऋषि” के नाम का जाप करने वाले को कभी भी पीड़ा नहीं देते है । शिव का अवतार और महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्लाद ऋषि पीपल वृक्ष के नीचे अवतरित हुए थे, स्वयं ब्रह्मा ने ही शिव के इस अवतार का नामकरण किया था।
  • पुराणों में वर्णित है कि पिप्पलाद ऋषि ने अपने बचपन में माता पिता के वियोग का कारण शनि देव को जानकर उनपर ब्रह्म दंड से प्रहार कर दिया, जिससे शनि देव घायल हो गए। देवताओं की प्रार्थना पर पिप्पलाद ऋषि ने शनि देव को इस बात पर क्षमा किया कि शनि जन्म से लेकर 16 साल तक की आयु तक एवं उनके भक्तो को किसी को भी कष्ट नहीं देंगे। तभी से पिप्पलाद का स्मरण करने से ही शनि देव के प्रकोप से मुक्ति मिल जाती है।
  • शिवपुराण के अनुसार शनिवार के दिन पिप्पलाद श्लोक का या पिप्पलाद ऋषि जी के केवल इन तीन नामों (पिप्पलाद, गाधि, कौशिक) को जपने से शनि की पीड़ा शान्त हो जाती है ।

*विक्रम संवत् 2077 संवत्सर कीलक तदुपरि सौम्य
* शक संवत – 1942,
*कलि संवत 5122
* अयन – दक्षिणायन,
* ऋतु – शरद ऋतु,
* मास – अश्विन  माह
* पक्ष – क्ष शुक्ल पक्ष
*चंद्र बल –मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, धनु, मकर,

  • तिथि का स्वामी – प्रतिपदा तिथि के स्वामी अग्नि देव जी जी है । ।

आज प्रतिपदा है । प्रतिपदा तिथि के स्वामी अग्नि देव हैं।

नवरात्री के पहले दिन माँ शैलपुत्री की आराधना की जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में माँ दुर्गा का पहला स्वरूप हैं । पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। मां शैलपूत्री सौभाग्‍य का प्रतीक मानी गयी हैं।

माँ शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। देवी का वाहन बैल है। मां शैलपुत्री के मस्तक पर अर्ध चंद्र विराजित है। माता शैलपुत्री मूलाधार चक्र की देवी मानी जाती हैं। अपने पूर्व जन्म में ये सती के रूप में प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं, उस जन्म में सती माता का विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।

पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी ‘शैलपुत्री’ देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। अर्थात इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां शैलपुत्री चंद्रमा के दोष को दूर करती हैं। जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, उन्हें माता के शैलपुत्री स्वरूप की आराधना करनी चाहिए।

आज माता के दिव्य मन्त्र – ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। की एक माला का जप अवश्य ही करना चाहिए ।
पहला नवरात्र के दिन मां शैलपुत्री को गाय के घी भोग लगाने चाहिए, इससे आरोग्य की प्राप्ति होती है ।

नक्षत्र (Nakshatra)- चित्रा 11:52 A.M. तक तत्पश्चात स्वाती

चित्रा नक्षत्र के देवता विश्वकर्मा जी और स्वामी मंगल देव जी है।
आकाश मंडल में चित्रा नक्षत्र को 14 वां नक्षत्र माना जाता है। चित्रा में इन्द्र का व्रत और पूजन किया जाता है। यह सीप का मोती या उज्जवल गहना सा नज़र आता है।  चित्रा नक्षत्र का शिल्प कौशल, निर्माण के साथ जादुई संबंध होता है और इसे सबसे गतिशील नक्षत्रों में से एक माना जाता है। इस नक्षत्र का आराध्य वृक्ष : बेल तथा स्वाभाव तीक्षण माना गया है। चित्रा नक्षत्र सितारे का लिंग महिला है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक पर जीवन भर मंगल, बुध एवं शुक्र का प्रभाव बना रहता है।
चित्रा में जन्म लेने वाला धनवान, बुद्धिमान, महत्वाकांक्षी, साहसी, ऊर्जावान होते हैं। इनको जीवन में कई अवसर आते रहते हैं जिनसे भाग्य बदल सकता है।
यदि मंगल, बुध या शुक्र की जन्म कुंडली में खराब स्थिति है, तो जातक क्रोधी, पराई स्त्री में आसक्त, धोखेबाज और स्वार्थी भी बन जाते हैं।

चित्रा नक्षत्र में पैदा हुई स्त्री बेहद आकर्षक, स्वप्न दर्शी, हंसमुख, किन्तु आलसी हो सकती हैं। आप बहुत जल्दी ही दूसरो के विश्वास में आ जाती है, अगर इनके कहेनुसार कार्य नहीं हुआ तो यह विद्रोह तक करने को तैयार हो जाती है ।
चित्रा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 5, 6 और 9,  भाग्यशाली रंग, गहरा भूरा, काला, भाग्यशाली दिन रविवार और बुधवार माना जाता है ।
चित्रा नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ विश्वकर्मणे नम: “। मन्त्र की माला का जाप अवश्य करना चाहिए

  • प्रथम करण : -किंस्तुघ्न  -11:04 A.M. तक
  • गुलिक काल : – शनिवार को शुभ गुलिक प्रातः 6 से 7:30 बजे तक ।
  • दिशाशूल (Dishashool)- शनिवार को पूर्व दिशा का दिकशूल होता है । यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से अदरक खाकर, घी खाकर जाएँ ।
  • राहुकाल (Rahukaal)-सुबह – 9:00 से 10:30 तक।
  • सूर्योदय – प्रातः 06:10
  • सूर्यास्त – सायं 17:53
  • विशेष -प्रतिपदा को कद्दू नहीं खाना चाहिए।
  • पर्व त्यौहार- शरद नवरात्री का पहला नवरात्र
  • मुहूर्त (Muhurt) –

“हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।

आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

pandit-ji
ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )

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