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शुक्रवार का पंचांग | Shukrwar ka panchag

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शुक्रवार का पंचांग, Shukrwar ka panchag

शुक्रवार का पंचांग, shukrwar ka panchang, 23 अक्टूबर  2020 का पंचांग,

  • Panchang, पंचाग, ( Panchang 2020, हिन्दू पंचाग, Hindu Panchang ) पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं :-

    1:- तिथि (Tithi)
    2:- वार (Day)
    3:- नक्षत्र (Nakshatra)
    4:- योग (Yog)
    5:- करण (Karan)



    पंचाग (panchang) का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी नित्य पंचाग (panchang) का श्रवण करते थे ।
    जानिए शुक्रवार का पंचांग (Shukrawar Ka Panchang)।

इस वर्ष 2020 में तिथियों को लेकर उलझन की स्थिति इसलिए है क्योंकि 23 तारीख को सप्तमी सुबह 06:57 तत्पश्चात अष्टमी और 24 तारीख को सुबह 6:58 तक अष्टमी तत्पश्चात नवमी तिथि लग रही है। इसी तरह 25 तारीख को 7:41 तक नवमी तत्पश्चात दशमी लग रही है। इसलिए उलझन यह है कि किस दिन कौन सी तिथि मान्य होगी?
शास्त्रों में बताया गया है कि जिस दिन सूर्योदय के समय आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि हो उस दिन श्रीदुर्गाष्टमी और महाष्टमी का व्रत पूजन किया जाना चाहिए। लेकिन अष्टमी तिथि सूर्योदय के कम से कम 1 घड़ी यानी 24 मिनट तक होनी चाहिए। सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि को महाअष्टमी नहीं मानना चाहिए। लेकिन दूसरे दिन अष्टमी तिथि 24 मिनट से भी कम हो तब सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि को महाष्टमी का व्रत पूजन कर लेना चाहिए।
इसलिए अष्टमी 24 अक्टूबर शनिवार और नवमी 25 अक्टूबर रविवार को मनानी चाहिए । विजयदशमी का पर्व दशमी के अपराह्न के बाद मनाया जाता है इसलिए विजयदशमी 25 अक्टूबर रविवार को ही मनाई जाएगी ।
इसलिए जो अष्टमी को कन्या पूजन करते है उन्हें 24 अक्टूबर शनिवार को कन्या पूजन करना चाहिए तथा
जो नवमी को कन्या पूजन करते है उन्हें भी 24 अक्टूबर शनिवार को ही कन्या पूजन करना चाहिए ।
क्योंकि नवमी 25 अक्टूबर को सुबह 07:41 तक ही है इसलिए हवन संबंधी कार्य नवमी युक्त दशमी तिथि को यानी 25 अक्टूबर को किया जाना शास्त्र के अनुसार उचित रहेगा।

  • महालक्ष्मी मन्त्र : ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
  • ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥


।। आज का पंचांग, aaj ka panchang ।।

  • दिन (वार) – शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख से भगवान विष्णु पर जल चढ़ाकर उन्हें पीले चन्दन अथवा केसर का तिलक करें। इस उपाय में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।
    शुक्रवार के दिन नियम पूर्वक धन लाभ के लिए लक्ष्मी माँ को अत्यंत प्रिय “श्री सूक्त”, “महालक्ष्मी अष्टकम” एवं समस्त संकटो को दूर करने के लिए “माँ दुर्गा के 32 चमत्कारी नमो का पाठ” अवश्य ही करें । शुक्रवार के दिन माँ लक्ष्मी को हलवे या खीर का भोग लगाना चाहिए ।
    शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह की आराधना करने से जीवन में समस्त सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दाम्पत्य जीवन सुखमय होता है बड़ा भवन, विदेश यात्रा के योग बनते है।
  • *विक्रम संवत् 2077 संवत्सर कीलक तदुपरि सौम्य,
  • * शक संवत – 1942,
    *कलि संवत – 5122
    * अयन – दक्षिणायन,
    * ऋतु – शरद ऋतु,
    * मास – आश्विन माह।
    * पक्ष – शुक्ल पक्ष
    *चंद्र बल – मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन,

सप्तमी के स्वामी भगवान सूर्य देव हैं। इस दिन आदित्यह्रदय स्रोत्र का पाठ अवश्य करें। सप्तमी को काले, नीले वस्त्रो को धारण नहीं करना चाहिए।

नवरात्रि के सातवें दिन देवी दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा- आराधना की जाती है। मां के माता कालरात्रि के स्वरूप की पूजा करने से सभी तरह के पापो, शत्रुओं, नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है। माता कालरात्रि काल से भी रक्षा करने वाली शक्ति है। मां का रूप अत्यंत भयानक है एवं बाल बिखरे हुए हैं। मां कालरात्रि के तीन नेत्र हैं, इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है और ये गर्दभ की सवारी करती हैं।
माँ के ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है जो भक्तों को निर्भय रहने का आशीर्वाद देता है अर्थात माँ कालरात्रि के भक्तो की समस्त संकटो से रक्षा होती है। वहीँ बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है।

मां को गुड का भोग अर्पित करके पूजा के बाद सबको गुड का प्रसाद वितरित करना चाहिए ।
नवरात्री के सातवें दिन मां कालरात्रि की कृपा के लिए रात्रि में मां कालरात्रि के समक्ष दीपक जलाकर श्वेत या लाल वस्त्र धारण करके माँ की पूजा करें, एवं यहाँ दिए गए मन्त्र की एक माला का जाप करना चाहिए ।

“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे “

‘ॐ कालरात्र्यै नम:।’

  • नक्षत्र (Nakshatra) – उत्तराषाढ़ा 25.22 तक

उत्तराषाढा नक्षत्र के देवता दस विश्‍वदेव जी एवं नक्षत्र के स्वामी सूर्य देव जी है ।
उत्तराषाढा नक्षत्र 21 वें नंबर का नक्षत्र  है। उत्तराषाढ़ा’ का अर्थ होता है अजेय, विजय के पश्चात। यह एक हाथी के दांत जैसा प्रतीत होता है।
उत्तराषाढ़ नक्षत्र तारे का लिंग स्त्री है। उत्तराषाढा नक्षत्र का आराध्य वृक्ष कटहल और नक्षत्र का स्वभाव स्थिर माना गया है ।
उत्तराषाढा नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति एक सफल एवं स्वतंत्र व्यक्ति होते हैं। इन्हे ईश्वर में आस्था होती है, इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति प्रसन्न चित्त और मित्रो में लोकप्रिय होते है । विवाह के उपरान्त इनको जीवन में और अधिक सफलता प्राप्त होती है, इन्हे उत्तम पुत्र सुख मिलता है। यह घूमने फिरने के बहुत शौक़ीन होते है । 

उत्तराषाढा नक्षत्र के लिए भाग्यशाली संख्या 1, 3 और 8, भाग्यशाली रंग, तांबे का रंग, हल्का भूरा,  भाग्यशाली दिन गुरुवार और शुक्रवार का माना जाता है ।
उत्तराषाढा नक्षत्र में जन्मे जातको को तथा जिस दिन यह नक्षत्र हो उस दिन सभी को “ॐ उत्तराषाढाभ्यां नमः”। मन्त्र का जाप अवश्य करना चाहिए ।


  • योग(Yog) – धृति – 01:23 ए एम, अक्टूबर 24 तक तक
  • प्रथम करण : – वणिज – 06:57 A.M तक
  • द्वितीय करण : –विष्टि 18:52 तक
  • गुलिक काल : –
    शुक्रवार को शुभ गुलिक दिन 7:30 से 9:00 तक ।
  • दिशाशूल (Dishashool)-
    शुक्रवार को पश्चिम दिशा का दिकशूल होता है । यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से दही खाकर जाएँ ।
  • राहुकाल (Rahukaal)-दिन – 10:30 से 12:00 तक।
  • सूर्योदय -प्रातः 06:07
  • सूर्यास्त – सायं : 17:55
  • विशेष –
  • पर्व त्यौहार-
  • मुहूर्त (Muhurt) –

“हे आज की तिथि ( तिथि के स्वामी ), आज के वार, आज के नक्षत्र ( नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी ), आज के योग और आज के करण, आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातक पर अपनी कृपा बनाए रखे, इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव हीं श्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो “।

आप का आज का दिन अत्यंत मंगल दायक हो ।

pandit-ji
ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )


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