Sunday, October 2, 2022
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कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा विधि, Krishna Janmashtami ki puja vidhi, Krishna Janmashtami 2022,

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा विधि, Krishna Janmashtami ki puja vidhi,

श्री कृष्ण जन्माष्टमी 2022, Shri Krishna Janmashtami 2022,

  • हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्‍णपक्ष की अष्‍टमी तिथि में बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में रात्रि 12 बजे मथुरा नगरी में भगवान विष्णु ने कारागार में वासुदेव जी की पत्नी देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है।
  • वर्ष 2022 में 18 -19 अगस्त सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा।

सप्तमी तिथि 18 तारीख को रात्रि 09:20 बजे तक तक रहेगी तत्पश्चात अष्टमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी, जो अगले दिन 19 अगस्त को रात्रि 10:59 है।

बहुत से विद्वानों का यह मानना है कि जन्माष्टमी, अष्टमी तिथि के दिन रात्रि की 12 बजे मनाई जाती है। इसलिए 18 तारीख की रात्रि को 12 बजे श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाना चाहिए।

वहीं बहुत से अन्य विद्वानों का मानना है कि श्रीकृष्ण जी का जन्म अष्टमी तिथि को रात्रि के आठवें मुहूर्त में हुआ था वह आठवां मुहूर्त इस वर्ष 19 अगस्त शुक्रवार को रहेगा।

इसलिए वर्ष 2022 में 18 और 19 अगस्त दोनों ही दिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जायेगा। 18 अगस्त को गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग जन्माष्टमी का पर्व मनाएंगे। वहीं 19 अगस्त को साधु-संत जन्माष्टमी मनाएंगे।

हालांकि पंचांग और उदया तिथि के अनुसार 19 अगस्त को ही जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाना चाहिए।

भगवान श्री कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा में 19 अगस्त शुक्रवार को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जायेगा, वैसे भी करोड़ों भारतवासी / कृष्ण भक्त समान्यता मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि के अनुसार ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाते आए हैं।

इसलिए अधिकतर जगह लोग चाहे गृहस्थ हो या सन्यासी 19 अगस्त को ही जन्माष्टमी का ब्रत रखेंगे ।

ज्योतिष की गणना के अनुसार इस वर्ष 2022 में भगवान श्रीकृष्ण का 5250वां जन्म उत्सव मनाया जाएगा।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था, लेकिन इस वर्ष तिथि और नक्षत्र का यह संयोग नहीं मिल रहा हैं। अष्टमी तिथि 18 अगस्त रात्रि 9 बजकर 21 मिनट से प्रारम्भ हो जाएगी, जो 19 अगस्त को रात्रि 10 बजकर 59 मिनट तक रहेगी, जबकि 19 अगस्त को रात्रि 1 बजकर 54 मिनट से रोहिणी नक्षत्र का आरंभ होगा।

इस दिन उदया तिथि में अष्टमी तिथि रहेगी और रात्रि 10: 59 के बाद नवमी तिथि लग जाएगी। साथ उस दिन कृतिका नक्षत्र बन रहा है। कृत्तिका नक्षत्र 19 अगस्त को देर रात 1.53 तक रहेगा। इसके बाद रोहिणी नक्षत्र शुरू होगा, इसलिए इस बार जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी नहीं रहेगा।

इसलिए 19 अगस्त को ही श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाना उचित रहेगा ।

  • ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन दो बहुत ही शुभ योग वृद्धि योग और ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है ।

वृद्धि योग 17 अगस्त को शाम 08 बजकर 56 मिनट से लेकर 18 अगस्त को शाम 08 बजकर 41 मिनट तक है।

धुव्र योग 18 अगस्त को रात्रि 08 बजकर 41 मिनट से लेकर 19 अगस्त को रात्रि 08 बजकर 59 मिनट तक है।

जन्माष्टमी का व्रत अनंत गुना पुण्यदायक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी का व्रत रखे से हजारों-लाखों पाप नष्ट हो जाते है लेकिन एक जन्माष्टमी का व्रत हजार एकादशी व्रत के पुण्य के बराबर का माना है।

चाहते है जीवन में स्थाई सुख – समृद्धि तो जन्माष्टमी के दिन अवश्य करे ये उपाय,

  • मान्यता है कि इस दिन जो भी सच्चे मन से भगवान श्री कृष्ण का पूजन करता है, जन्माष्टमी का व्रत रखता है, उसे इस संसार में किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है, अंत में वह मोह-माया के बंधन से मुक्‍त हो जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    इस दिन सच्‍चे मन से व्रत करते हुए की गई कोई भी मनोकामना पूरी होती है। जन्माष्टमी में भगवान श्री कृष्ण का पूजन इस प्रकार करना चाहिए।

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा विधि,

  • जन्माष्टमी के दिन प्रात: सूर्योदय से पूर्ण उठाकर, स्नान आदि करके साफ पीले, गुलाबी या सफ़ेद वस्त्र धारण करने चाहिए । इसके बाद पूर्व या उत्तर की ओर भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल अथवा मिट्टी की जो भी संभव हो मूर्ति या चित्र ( लड्डू गोपाल का ) पालने में अथवा चौकी पर स्थापित करें। भगवान श्रीकृष्ण को नए पीले / लाल वस्त्र पहनाएं । इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण का पीले पुष्प चढ़ाकर उनका पूजन करें।
  • जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण मंदिर जाकर भगवान श्री कृष्ण को पीले फूलो की माला चढ़ाएं , मंदिर में पानी वाला नारियल चढ़ाएं ।
  • इस दिन भगवान श्री कृष्ण के निम्नलिखित मंत्रो का अधिक से अधिक जाप करे ।

द्वादशाक्षर श्रीकृष्ण मंत्र : “ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय”।।

श्री कृष्ण मन्त्र : “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम”।।

  • स्कन्द पुराण के मतानुसार– ये न कुर्वन्ति जानन्तः कृष्णजन्माष्टमीव्रतम,ते भवन्ति नराः प्राज्ञ व्याला व्याघ्रश्च कानने” अर्थात्–जो भी मनुष्य जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ( वृद्ध , रोगी एवं बच्चो को इसमें छूट है )
  • मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं।
  • ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार “जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है”।
  • भविष्य पुराण के अनुसार “जन्माष्टमी का व्रत अकाल मृत्यु नहीं होने देता है । जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं, उन्हें आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त होती है”।
  • शास्त्रों के अनुसार , एकादशी का व्रत हजारों – लाखों पाप नष्ट करनेवाला अदभुत ईश्वरीय वरदान है लेकिन एक जन्माष्टमी का व्रत हजार एकादशी व्रत रखने के पुण्य की बराबरी का है ।
  • भगवान श्री कृष्ण का जन्म रात्रि में 12 बजे हुआ था अत: 12 बजे के बाद श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएं। पूरे विश्व में हिन्दु घर्म के मानने वाले मंदिरो में एवं प्रतिक के रूप में घर पर श्री कृष्ण जी का ‘खीरा काटकर’ जन्म कराते है। जन्म के समय उनका दूध, दही, शुद्ध जल से अभिषेक किया जाता है ।
  • जन्म के पश्चात भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप ‘लड्डू गोपाल; को पालने झूला झुलाएं।
  • भगवान श्री कृष्ण को माखन मिश्री अत्यंत प्रिय थी । अपने बाल अवतार में कान्हा ने माखन के लिए बहुत गोपियों की मटकी फोड़ी थी, घरो से माखन चुराया था इसलिए उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है अत: उन्हें माखन मिश्री का भोग अवश्य ही लगाएं ।
  • जन्म के बाद प्रभु को पंचामृत में तुलसी डालकर ( भगवान श्री कृष्ण की पूजा बिना तुलसी के पूर्ण नहीं होती है) व माखन, मिश्री, चावल / सबुतदाने की खीर, पंजीरी, खीरा आदि का भोग लगाएं।
    इलाइची, 5 फल, नारियल आदि अर्पित करे । श्रीकृष्‍ण भगवान की आरती करें और आरती के बाद प्रशाद बाँटे।
  • श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के दौरान भगवान के निकट एक बांसुरी रखना ना भूलें क्योंकि उसके बिना श्री कृष्ण का श्रंगार पूरा नहीं होता ।
  • जो जातक जन्माष्टमी का ब्रत रखते है वे दिन में फलाहार लेते है एवं रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद ही भोजन ग्रहण करते है। इस ब्रत का कोई विशेष नियम नहीं है, बहुत से भक्त गण जन्माष्टमी के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात अपना ब्रत पूरा करते है।
    अगर कोई भक्त किसी कारणवश ब्रत रखने में समर्थ नहीं है तो भी यदि वह पूरे मन से जन्माष्टमी को कान्हा की भक्ति करते है तो उन्हें द्वारकाधीश की पूर्ण कृपा मिलती है।
  • वैसे तो जन्माष्टमी का पर्व पूरे भारत में हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन उत्तर भारत विशेषकर मथुरा, वृन्दावन, और गोकुल में इस पर्व की अलग ही धूम देखने को मिलती है।
    जन्माष्टमी के दिन यहाँ के मंदिरो को विशेष रूप से सजाया जाता है और यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव देखते ही बनता है इन आयोजनों में यहाँ पर विश्व के कोने कोने से भगवान श्री कृष्ण के भक्त आते है ।
  • गुजरात जहाँ पर मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अदभुत नगरी द्वारिका बसाई थी वहाँ पर द्वारकाधीश मंदिर में कृष्ण भक्त जन्माष्टमी के पर्व को , कान्हा के जन्म को अत्यंत धूम धाम से मनाते है।
  • महाराष्ट्र में सभी ओर विशेषकर मुंबई और पुणे में जन्माष्टमी का पावन पर्व अलग ही रूप में मनाया जाता है।यहाँ का दही हाँडी उत्सव ना केवल महाराष्ट्र में वरन पूरे भारत में प्रसिद्द है ।
    यहाँ पर ऊँची ऊँची दही हांडियों को फोड़ने के लिए, आकर्षक इनाम जीतने के लिए गोविंदाओं की टोली ( जो दही हांडियों को फोड़ते है ) लम्बे समय से तैयारी में जुटी रहती है।
  • इसमें लड़के / लड़कियों का समूह एक के ऊपर एक चढ़कर इन हांडियों को फोड़ने के लिए पिरामिड बनाता है और जो सबसे ऊपर होता है उसे दही हाँडी फोड़ने का सौभाग्य मिलता है।
  • लेकिन कई बार दही हाँडी को फोड़ने के लिए बहुत से गोविंदाओं की टोलियों को जम कर पसीना बहाना पड़ता है , और कई बार बहुत प्रयासों के बाद ही सफलता हाथ लगती है ।
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