Wednesday, December 2, 2020
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Karva Chauth ka Mahatv, करवा चौथ का महत्त्व,

Karva Chauth ka Mahatv, करवा चौथ का महत्व,

हिन्दू धर्म विशेषकर उत्तर भारत में करवा चौथ का महत्व Karva Chauth ka Mahatv, बहुत अधिक है । हर स्त्री चाहती है कि वह सदा सुहागन रहे, उसके सुहाग अर्थात उसके पति की उम्र लम्बी हो उनके दाम्पत्य जीवन में मधुरता, मिठास बनी रहे । इसीलिए कार्तिक माह की कृष्ण चन्द्रोदय चतुर्थी के दिन पत्नियाँ अपने अखंड सौभाग्य की कामना और अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ Karva Chowth का निर्जल व्रत रखती हैं।

करवा चौथ Karva Chowth का व्रत भारतीय संस्कृति के अत्यंत पवित्र बंधन पति-पत्नी के बीच प्यार का प्रतीक है । भारतीय संस्कृति में पति को ईश्वर का दर्ज प्राप्त है इसी लिए उसे परमेश्वर माना गया है। यह व्रत पति पत्नी दोनों के लिए ही एक-दूसरे के प्रति नव प्रणय निवेदन, हर्ष, प्रसन्नता, अपार प्रेम एवं त्याग को लेकर आता है।

इस ब्रत में सौभाग्यवती स्त्रियां भगवान शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन करती है। यह ब्रत पति-पत्नी के पवित्र, अटूट और आत्मिक बंधन का प्रतीक है और यह उनके पवित्र रिश्ते में नई ताजगी एवं मिठास लाता है।
इस दिन पत्नियाँ सुबह से निर्जल ब्रत रखती है जो रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद उसे अर्घ्य देकर चलनी के अंदर से अपने पति का चेहरा देखकर अपने पति के हाथो से पानी पीकर ही पूर्ण माना जाता है ।

इस बार 2020 को करवा चौथ का ब्रत (Karva Chowth Ka Vrat) 04 अक्टूबर दिन बुधवार को पड़ेगा ।
चतुर्थी तिथि 4 नवंबर 2020 की सुबह 4 बजकर 24 मिनट से प्रारम्भ होगी और अगले दिन 5 नवंबर 2020 को सुबह 6 बजकर 14 मिनट पर यह समाप्त होगी।

करवा चौथ Karva Chowth के दिन शाम 05 बजकर 34 मिनट से शाम 06 बजकर 52 मिनट तक का समय पूजा के लिए बहुत शुभ है, जिसके अंदर पूजा करने से श्रेष्ठ फल प्राप्त होंगे । इस दिन चन्द्रोदय का समय लगभग रात 07:57 बजे पर है जिसके बाद चन्द्रमा अर्घ्य देकर सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपना ब्रत खोल सकती है ।
इस दिन उगते हुए चन्द्रमा को जिसमे लालिमा रहती है जल देना ही श्रेयकर होता है । करवा चौथ Karva Chowth दक्षिण भारत की तुलना में उत्तरी भारत में बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है।

करवा चौथ Karva Chowth की शुरुआत उससे 3-4 दिन पहले से ही हो जाती है जब सास अपनी बहु को सरगी ( श्रंगार का सामान, फल, मीठा, आदि ) देती है । यह सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद होता है । अब सरगी में पैसे दिए जाते है, मान्यता है कि बहु को इन्ही पैसे से अपने लिए श्रंगार का सामान, मिठाई, फल आदि लेने चाहिए ।

व्रत वाले दिन स्त्रियाँ प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन कर श्रंगार करके भगवान शिव-पार्वती के आगे माथा टेककर अपने लिए सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद मांगती है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी भगवान को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था ।
उसके बाद अपनी सास द्वारा दी गयी सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं जैसे फल, मिठाई आदि को व्रती महिलाएं प्रातः काल में तारों की छांव में ही ग्रहण कर लेती हैं। तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है।
व्रत यह संकल्प बोल कर आरंभ करना चाहिए –

मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।

इस दिन स्त्रियां अपना पूरी तरह से दुल्हन की तरह साज-श्रृंगार करती हैं, अपने हाथों में मेहंदी और पैरो में महावर रचाती हैं और पूजा के समय लाल, गुलाबी, सुनहरे, पीले आदि सुन्दर / नए वस्त्र पहनती हैं। इस दिन काले, सफ़ेद आदि वस्त्र नहीं पहनने चाहिए ।

हिन्दु धर्म में लाल रंग का विशेष महत्व है। लाल रंग को प्रेम, काम तथा ऊर्जा का प्रतीक मानते है। पूजा, विवाह तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर भी लाल रंग का जोड़ा पहना जाता है।

मान्यता है कि लाल जोड़े को पहनने से ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसी कारण से करवा चौथ पर भी सुहागिनों को लाल रंग का जोड़ा पहनना शुभ माना जाता है। यदि किसी कारण से यह संभव न हो सके तो लाल रंग की चुनरी तो अवश्य ही धारण करें ।

करवा चौथ Karva Chowth के दिन दोपहर में सुहागन स्त्रियां एक जगह एकत्रित होकर शगुन के गीत गाती हैं और शाम के समय कथा सुनने के बाद सर्वप्रथम अपनी सासू मां के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं।

इस दिन स्त्रियाँ रात्रि के समय चन्द्रमा के निकलने के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य देकर उसकी पूजा करती हैं। फिर छलनी से चंद्र दर्शन के बाद उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखकर पति के हाथों से जल पीकर अपने व्रत को पूर्ण करती है।

इस दिन स्त्रियां नव वधू की भांति पूर्ण श्रंगार कर सुहागिन के रूप में चंद्रमा से अपने अखंड सुहाग की प्रार्थना करती हैं। स्त्रियां ईश्वर के समक्ष यह प्रण भी करती हैं कि वे तन, मन, वचन एवं कर्म से अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखेंगी, उनके अनुकूल रहेंगी अपने आचार व्यवहार से पत्नी के रूप में अपने घर, समाज के समस्त दायित्वों का सहर्ष निर्वाह करेंगी ।
कुंआरी कन्याएं इस दिन गौरा देवी का पूजन करती हैं जिससे उन्हें योग्य और प्रेम करने वाला समर्पित वर प्राप्त हो।

इस व्रत में रात्रि में भगवान शिव, माता पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, प्रभु गणेश और चंद्रमा जी के चित्रों एवं सुहाग की वस्तुओं की पूजा का भी विधान है।

करवा चौथ Karva Chowth के दौरान करवा का बहुत महत्व होता है। करवा मिट्टी का बर्तन होता है । इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ करवा माँ से अपने पति की लम्बी आयु, पति से अटूट प्रेम और सुखी दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद मांगती है और पूजा के बाद इस करवा को अनेको उपहारों के साथ अपनी सास या सास के ना होने पर किसी योग्य महिला ( जिसे अपनी सास माना हो ) अथवा योग्य ब्राह्मण को दान में भी दिया जाता है।

करवा चौथ में ना करे ये काम, karva chowth men na karen ye kaam

करवाचौथ karva chowth के दिन विवाहित महिलाएं किसी को भी दूध, दही, चावल कोई भी सफेद कपड़ा या अन्य सफेद वस्तु न दें, मान्यता है कि ऐसा करने से चंद्र देव नाराज हो जाते हैं और उसके अशुभ फल मिल सकते हैं|

इस दिन विवाहिता स्त्री को सास, ससुर, जेठ-जेठानी आदि किसी भी बड़े बुजुर्ग का भूल कर भी अपमान नहीं करना चाहिए अन्यथा माँ गौरी, गणपति जी, रुष्ट हो जाते है, उस स्त्री का व्रत पूरा नहीं माना जाता वर्ष भर घर में कलह, आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है |

करवाचौथ karva chowth का व्रत करने वाली महिला को इस दिन सफेद या काला रंग नहीं पहनना चाहिए | इस दिन सफ़ेद और काले रंग के वस्त्र पहनना अशुभ माना जाता हैं| इस दिन वे लाल, पीले, गुलाबी रंग के वस्त्र पहनें जो सुहाग से जुड़े रंग माने जाते हैं, इन रंगो के वस्त्र धारण करना सुहागिनों के लिए शुभ माना जाता है|

पं मुक्ति नारायण पाण्डेय
( कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )
Published By : Memory Museum
Updated On : 2020-11-01 11:56:00 PM

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