
holika dahan ka muhurat, होलिका दहन का मुहूर्त, holika dahan 2026,
होली, holi, हमारे भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। हर्ष, उल्लास और रंगों का यह त्योहार मुख्यतया: दो दिन मनाया जाता है, होलिका दहन, holika dahan और रंगो का पर्व धुलेंडी।
पहले दिन होलिका दहन, holika dahan होता है इस दिन होलिका जलायी जाती है और दूसरे दिन लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल लगाते हैं, इसे धुलेंडी कहा जाता है, इस दिन हुलियारों की टोलियाँ ढोल बजा बजा घूम,घूम कर होली खेलती है । इस दिन लोग एक दूसरे के घर जा कर रंग लगाते है और गले मिलते है। होली के दिन लोग पुरानी से पुरानी कटुता को भूला कर गले मिलकर फिर से दोस्त बन जाते हैं।
होली हमारे देश में बहुत ही प्राचीन समय से मनाई जाती है। अनेको प्राचीन धर्म ग्रंथों, मध्ययुगीन पुस्तकों और मुगलकालीन इतिहास में भी होली खेले जाने का उल्लेख्य है।
holika dahan ka muhurat, होलिका दहन का मुहूर्त,
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सभी त्योहारों को मुहूर्त के अनुसार मनाना ही उत्तम रहता है । होलिका दहन का मुहूर्त, holika dahan ka muhurat, का अवश्य ही ध्यान रखें ।
नारद पुराण के अनुसार होलिका दहन, holika dahan फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को भद्रारहित प्रदोष काल में करना चाहिए, होलिका का दहन विधिवत रुप से होलिका का पूजन करने के बाद ही करना श्रेष्ठ है।
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मान्यता है कि भद्रा के समय में होलिका दहन, holika dahan करने से उस क्षेत्र में अशुभ घटनाएं हो सकती है इसके अलावा चतुर्दशी तिथि, प्रतिपदा एवं सूर्यास्त से पहले कभी भी होलिका दहन नहीं करना चाहिए।
मूहर्त चिंतामणि ग्रंथ के अनुसार भद्रा काल में रक्षा बंधन और होलिका दहन दोनों को ही वर्जित बताया गया है ।
निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार भद्रा काल में होली जलाने से देश पर संकट आ सकता है और देशवासियों को बड़े भयानक कष्ट का सामना करना पड़ सकता है । इसलिए होली का दहन भद्रा काल में कदापि नहीं करना चाहिए ।
भद्रायां दीपिता होली राष्ट्रभंगं करोति वै।
– पुराणसमुच्चय
भद्रा में होली दाह से राष्ट्रभंग होता है।
शास्त्रों के अनुसार अगर होलिका दहन के समय में भद्रा आ रही हो तो होलिका दहन का मुहूर्त हमेशा भद्रा मुख का त्याग करके निर्धारित होता है क्योंकि भद्रा मुख में होलिका दहन बिलकुल वर्जित है।
धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भद्रा मुख में किया होली दहन अनिष्ट को बुलावा देना जैसा है जिसका दुषपरिणाम दहन करने वाले और उस शहर उस देशवासियों को भी भुगतना पड़ सकता है।

इसके अतिरिक्त यदि भद्रा पूँछ प्रदोष से पहले और मध्य रात्रि के बाद भी हो तो उसे भी होलिका दहन के लिये नहीं लिया जा सकता क्योंकि होलिका दहन का मुहूर्त सूर्यास्त और मध्य रात्रि के बीच ही उचित माना जाता है, भद्रारहित रात्रि के चौथे प्रहर में सूर्योदय से पूर्व भी होलिका का दहन किया जा सकता है।
इस वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा पर सोमवार 2 मार्च को भद्रा तिथि सांय 17:46 पर पूर्णिमा तिथि लगते ही लग जाएगी जो अगले सूर्योदय से पूर्व 05:19 तक रहेगी।
अर्थात मध्य रात्रि में 12.30 AM से 02.10 AM के मध्य भद्रा का पुछ मिल रहा है और सूर्योदय 3 मार्च को प्रात: 6.45 AM पर हो रहा है लेकिन इसी दिन 3 मार्च मंगलवार को दोपहर में लगने वाले चंद्र ग्रहण का सूतक 9 घंटे पहले 06.21 AM पर लग रहा है अर्थात
3 मार्च की सुबह भद्रा की समाप्ति के बाद 05.20 AM से 06.20 AM के मध्य भी होलिका दहन किया जा सकता है ।
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फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि सोमवार 02 मार्च को शाम 17 बजकर 32 मिनट से शुरू होगी जो मंगलवार 3 मार्च शुक्रवार को शाम 16 बजकर 46 मिनट तक रहेगी ।
3 मार्च मंगलवार को चंद्रग्रहण भी लग रहा है । यह चंद्र ग्रहण भारतीय समय के अनुसार दोपहर 3 बजकर 21 मिनट को लगेगा और शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा । पंचांग के अनुसार यह ग्रहण भारत में भी नज़र आएगा ।
भारत में इस दिन चंद्रोदय सांय 6.16 PM पर होगा यानि चद्रोदय के समय से ही ग्रहण होगा जो सांय 06.47 पर समाप्त हो जायेगा अर्थात यह चंद्र ग्रहण भारत में 31 मिनट तक ही नज़र आएगा ।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले ही सूतक काल प्रारम्भ हो जाता है । अर्थात मंगलवार 3 मार्च को सुबह करीब 6 बजकर 21 मिनट से सूतक लग जाएगा जो शाम 6 बजकर 47 मिनट तक अर्थात ग्रहण काल के दौरान लगा रहेगा ।
सूतक काल में किसी भी प्रकार का शुभ कार्य और उत्सव आदि मनाना वर्जित माना गया है । इसलिए विद्वान ज्योतिषियों के अनुसार मंगलवार 3 मार्च को रंग नहीं खेलना चाहिए वरन होली का रंग बुधवार 4 मार्च को खेलना उचित रहेगा ।
प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा।
संवत्सरं तु तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम्॥
– चन्द्रप्रकाश
प्रतिपदा, चतुर्दशी, भद्रा और दिन, इनमें होली जलाना सर्वथा त्याज्य है। दुर्भाग्यवश इनमे यदि होली जला दी जाए तो वहाँ के राज्य, नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पातों से एक ही वर्ष में हीन क्षीण हो जाते हैं।
अर्थात होलिका दहन पूर्णिमा में ही शुभ माना जाता है और प्रतिपदा, सूर्योदय, चतुदर्शी व भद्रा में होलिका दहन नहीं किया जा सकता है।
होलिका दहन का मुहूर्त :– 2 – 3 मार्च मध्य रात्रि में 12.20 AM से 02.10 AM तक
3 मार्च सुबह भद्रा की समाप्ति के बाद 05.20 AM से 06.20 AM के मध्य
चंद्र ग्रहण 2026 का समय
प्रारम्भ : 03 मार्च, दोपहर 3 बजकर 21 मिनट से
समाप्ति: 03 मार्च, शाम 6 बजकर 47 मिनट तक
भारत में ग्रहण 3 मार्च सांय 6.16 PM से सांय 06.47 तक
नारद पुराण में होलिका दहन की कथा मिलती है इसके अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन अत्याचारी राजा हरिण्यकश्यप के कहने पर उसकी बहन होलिका हरिण्यकश्यप के पुत्र विष्णु भक्त प्रह्लाद को आग में भस्म करने के लिए उसे अपनी गोद में बैठाकर अग्नि में बैठ गई ।
शास्त्रों के अनुसार होलिका को यह वरदान था कि उसे अग्नि जला नहीं सकती है। लेकिन भगवान श्री विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करते हुए उसे आग में जलने से बचा लिया। वहीं होलिका वरदान के बाद भी अग्नि में भस्म हो गई।
इसीलिए बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका का दहन किया जाता है।
होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। इसके अगले दिन हर्ष उल्लास के साथ रंगों से खेलने की परंपरा है इसे धुलेंडी, के नाम से भी जाना जाता है।

होली का रंग हमेशा पड़ेवा अर्थात प्रतिपदा ( पूर्णिमा के अगले दिन ) खेलना ही शुभ माना जाता है इसलिए होली का रंग 4 मार्च को सूर्योदय के बाद ही खेला जायेगा । रंग खेलने के लिए 4 मार्च को सूर्योदय 6 बजकर 10 मिनट से दोपहर तक का समय अच्छा रहेगा।
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ज्योतिषाचार्य मुक्ति नारायण पाण्डेय
( हस्त रेखा, कुंडली, ज्योतिष विशेषज्ञ )

