Wednesday, December 2, 2020
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पितरों का महत्त्व, Pitron ka Mahatva,

पितरों का महत्त्व, Pitron ka Mahatva,

  • संसार के समस्त धर्मों में कहा गया है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है वरन वह किसी ना किसी रूप में बना ही रहता हे। जैसे मनुष्य कपड़ों को समय समय पर बदलते रहते है उसी तरह जीव को भी शरीर बदलने पड़ते है जिस प्रकार तमाम जीवन भर एक ही कपड़ा नहीं पहना जा सकता है उसी प्रकार आत्मा अनन्त समय तक एक ही शरीर में नही ठहर सकती है।

ना जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूपः ऊजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गीता.2ए अध्याय.20

  • अर्थात आत्मा ना तो कभी जन्म लेती है और ना ही मरती है मरना जीना तो शरीर का धर्म है शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी भी नष्ट नहीं होता है वरन् उसके रूप में परिवर्तन हो जाता है।
  • पितृ हमारे ही कुल के पूर्वजो की आत्माए है जो ईश्वर को प्यारे हो चुके है। यह पितृ लोक में वास करती है पर इनकी आसक्ति हमारे घर के सभी सदस्यों पर होती है।
  • गरूड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात आत्मा प्रेत रूप में यमलोक की यात्रा शुरू करती है। सफर के दौरान संतान द्वारा प्रदान किये गये पिण्डों से प्रेत आत्मा को बल मिलता है। यमलोक में पहुंचने पर उस आत्मा को अपने कर्मानुसार प्रेत योनी में ही रहना पड़ता है अथवा अन्य योनी प्राप्त होती है।
  • हिन्दू धर्म में पितरों को देवताओं के समान पूजनीय बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार चन्द्रमा के ऊपर एक अन्य लोक है जो पितर लोक कहलाता है। जैसे मनुष्य मनुष्य लोक में रहता है वैसे ही पुण्य आत्माए पितृ लोक में रहती है। पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इनसे उपर स्वर्ग लोक है।
  • गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वह पितरों में अर्यमा नामक पितृ हैं। अर्थात पितरों की पूजा करने से भगवान श्री कृष्ण / भगवान विष्णु की ही पूजा होती है।
    विष्णु पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के पीठ से पितर उत्पन्न हुए। पितरों के उत्पन्न होने के बाद ब्रह्मा जी ने अपने उस शरीर को त्याग दिया था । पितर को जन्म देने वाला ब्रह्मा जी का शरीर संध्या बन गया, इसलिए पितर संध्या के समय शक्तिशाली होते हैं।
  • हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य पितृ के समान माने जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के वक़्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि होते हैं।
  • क्या आप जानते है कि पितृ पक्ष अश्विन माह में ही क्यों आते है दरअसल हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है।
  • पितृ पक्ष की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में पितृ पक्ष में अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और अपने वंशजो से अपने निमित तर्पण, श्राद्ध, दान-पुण्य, अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को अपना शुभ आर्शीवाद देकर चले जाते हैं।
    शास्त्रों में पितरो को देवताओं से भी अधिक दयालु और कृपालु कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार हमारे पितृ पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध द्वारा वर्ष भर तृप्त रहते हैं। मान्यता है कि जिस घर में पूर्वजों का श्राद्ध होता है वह घर पितरों द्वारा सदैव हर आपदाओं से सुरक्षित रहता है।
  • व्यक्ति के सत्संस्कार होने के बाद यही अक्षय आत्मा पित्तर रूप में क्रियाशील रहती है तथा अपनी आत्मोन्नति के लिये प्रयासरत रहने के साथ पृथ्वी पर अपने स्वजनों एवं सुपात्रों की मदद के लिये सदैव तैयार रहती है।
  • पित्तरों के प्रति श्रृद्धा उनका स्मरण एवं उचित संस्कार करने से हमें सदैव पित्तरों से लाभ ही मिलता है। पित्तर वह उच्च आत्माएं होती है जो अपने स्वभाव एवं संस्कार के कारण दूसरों की यथासम्भव सहायता करती है। हिन्दु धर्म ग्रंथो में पितरों को संदेशवाहक भी कहा गया है|

शास्त्रों में लिखा है………….. ॐ अर्यमा न तृप्यताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नम:।ॐ मृर्त्योमा अमृतं गमय||

  • अर्थात, अर्यमा पितरों के देव हैं, जो सबसे श्रेष्ठ है उन अर्यमा देव को प्रणाम करता हूँ ।

  • हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारम्बार प्रणाम है । आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें। इसका अर्थ है कि हम पूरे वर्ष भर अपने देवों को समर्पित अनेकों पर्वों का आयोजन करते हैं, लेकिन हममे से बहुत लोग यह महसूस करते है की हमारी प्रार्थना देवों तक नही पहुँच प़ा रही है। हमारे पूर्वज देवों और हमारे मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं,और जब हमारे पितृ हमारी श्रद्धा, हमारे भाव, हमारे कर्मों से तृप्त हो जाते है हमसे संतुष्ट हो जाते है तो उनके माध्यम से उनके आशीर्वाद से देवों तक हमारी प्रार्थना बहुत ही आसानी से पहुँच जाती है और हमें मनवांछित फलों की शीघ्रता से प्राप्ति होती है ।
  • पित्तरों का सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण यह अपने परिजनों स्वजनों को सतर्क करती रहती है तथा तमाम कठनाइयों को दूर कराकर उन्हें सफलता भी दिलाती है। समान्यतः यह सर्वसाधारण को अपनी उपस्थिति का आभास भी नहीं देते है परन्तु उपर्युक्त मनोवृर्ति एवं व्यक्तित्व को देखकर यह उपस्थित होकर भी सहयोग एवं परामर्श देते है।
    पित्तरों का उद्देश्य ही अपने वंशजों को पितृवत स्नेह दुलार सहयोग एवं खुशियां प्रदान करना है संसार में तमाम उदाहरण उपलब्ध है जब इन्होंने दैवीय वरदान के रूप में मदद की है।

Pandit Jihttps://www.memorymuseum.net
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